प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य: स्तूप, गुफाएँ, मंदिर और मूर्तिकला Part 1
1. परिचय
प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य (Ancient Indian Art and Architecture) भारतीय इतिहास का वह महत्त्वपूर्ण पक्ष है, जिसके माध्यम से हम तत्कालीन समाज की धार्मिक मान्यताओं, राजनीतिक शक्ति, आर्थिक समृद्धि, तकनीकी क्षमता, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक संपर्कों को समझ सकते हैं। प्राचीन भारत के स्तूप, शैलकृत गुफाएँ, मंदिर, मूर्तियाँ, चित्रकलाएँ तथा स्थापत्य अवशेष केवल सुंदर निर्माण नहीं हैं, बल्कि वे अपने समय के समाज और विचारों के भौतिक साक्ष्य भी हैं।
भारतीय कला का विकास किसी एक राजवंश, धर्म या क्षेत्र तक सीमित नहीं था। इसकी जड़ें प्रागैतिहासिक शैलचित्रों और सिंधु घाटी सभ्यता की नगरीय संस्कृति तक जाती हैं। बाद में मौर्य, शुंग, सातवाहन, कुषाण, गुप्त, वाकाटक तथा दक्षिण भारत के विभिन्न राजवंशों के संरक्षण में कला और स्थापत्य के अनेक रूप विकसित हुए।
इस विकास को समझने के लिए चार प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है:
स्तूप (Stupa): बौद्ध धर्म से संबंधित स्मारकीय संरचनाएँ, जिनका विकास अवशेषों, स्मृति और धार्मिक उपासना से जुड़ा था।
गुफा वास्तुकला (Cave Architecture): पहाड़ियों और चट्टानों को काटकर बनाए गए धार्मिक, आवासीय तथा उपासना संबंधी परिसर।
मंदिर वास्तुकला (Temple Architecture): देवप्रतिमा, गर्भगृह, शिखर या विमान तथा अन्य स्थापत्य घटकों पर आधारित धार्मिक संरचनाएँ।
मूर्तिकला (Sculpture): पत्थर, धातु, मिट्टी और अन्य माध्यमों में निर्मित प्रतिमाएँ, जिनसे धार्मिक प्रतीकों, मानव आकृतियों, राजकीय विचारों और कलात्मक परंपराओं की जानकारी मिलती है।
इनके अतिरिक्त चित्रकला, स्तंभ, तोरण, विहार, चैत्यगृह, सजावटी कला और निर्माण तकनीक भी प्राचीन भारतीय कला की समझ के लिए आवश्यक हैं।
प्राचीन भारतीय कला का अध्ययन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
कला और स्थापत्य के अध्ययन से इतिहासकारों को उन प्रश्नों के उत्तर खोजने में सहायता मिलती है, जिनका पूरा विवरण साहित्यिक स्रोतों में उपलब्ध नहीं है।
उदाहरण के लिए:
किसी स्मारक का निर्माण किस धार्मिक परंपरा से जुड़ा था?
किसी क्षेत्र में पत्थर की विशिष्ट मूर्तिकला शैली क्यों विकसित हुई?
बौद्ध स्मारकों के विस्तार में व्यापारियों और शिल्पकारों की क्या भूमिका थी?
भारतीय मंदिर वास्तुकला में क्षेत्रीय विविधताएँ कैसे विकसित हुईं?
गांधार और मथुरा कला में दिखाई देने वाले अंतर से सांस्कृतिक संपर्कों के बारे में क्या पता चलता है?
किसी स्मारक के निर्माण, विस्तार और संरक्षण से राजनीतिक सत्ता तथा आर्थिक संसाधनों का क्या संबंध सामने आता है?
इन प्रश्नों के उत्तर प्राचीन कला को केवल तथ्यों की सूची के बजाय ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समझने में मदद करते हैं।
अध्ययन का मूल सूत्र: स्थापत्य को उसके धार्मिक संदर्भ, राजनीतिक संरक्षण, आर्थिक आधार, भौगोलिक परिस्थितियों और कलात्मक तकनीक के साथ जोड़कर पढ़ें।
2. UPSC, UPPSC एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में महत्व
प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य सामान्य अध्ययन के भारतीय विरासत एवं संस्कृति (Indian Heritage and Culture) खंड तथा प्राचीन इतिहास, दोनों से संबंधित है। इसमें सीधे तथ्यात्मक प्रश्नों के साथ-साथ तुलना, कथन-आधारित प्रश्न और सांस्कृतिक विकास की व्याख्या पर आधारित प्रश्न भी बनाए जा सकते हैं।
2.1 UPSC Prelims में महत्व
प्रारंभिक परीक्षा के लिए निम्नलिखित क्षेत्र विशेष रूप से उपयोगी हैं:
प्रमुख स्तूपों का स्थान, संरक्षक और स्थापत्य विशेषताएँ।
चैत्यगृह तथा विहार में अंतर।
मौर्यकालीन स्तंभों और मौर्यकालीन पॉलिश की विशेषताएँ।
भरहुत, साँची और अमरावती की कला परंपराएँ।
गांधार, मथुरा तथा अमरावती कला की तुलनात्मक विशेषताएँ।
अजंता, एलोरा, कार्ले, भाजा और उदयगिरि की गुफाएँ।
नागर, द्रविड़ तथा वेसर मंदिर वास्तुकला की पहचान।
गर्भगृह, मंडप, शिखर, विमान और गोपुरम जैसे स्थापत्य शब्द।
गुप्तकालीन मंदिरों और मूर्तिकला की विशेषताएँ।
धार्मिक प्रतीकों, प्रतिमाओं तथा बौद्ध स्थापत्य के विकास का क्रम।
निर्माण सामग्री, तकनीक और क्षेत्रीय शैलियों का संबंध।
परीक्षा में केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि कोई स्मारक कहाँ स्थित है। यह भी समझना चाहिए कि उसका संबंध किस स्थापत्य परंपरा, धार्मिक समुदाय या कलात्मक शैली से है।
2.2 UPSC Mains में महत्व
मुख्य परीक्षा के लिए यह विषय भारतीय संस्कृति की निरंतरता और परिवर्तन को समझने का अवसर देता है।
विश्लेषण के प्रमुख आयाम:
प्राचीन भारतीय कला के विकास में धर्म और राजकीय संरक्षण की भूमिका।
बौद्ध स्मारकों के निर्माण में व्यापारी समुदायों और दानदाताओं का योगदान।
भारतीय मंदिर वास्तुकला में क्षेत्रीय विविधता का विकास।
गांधार कला में बाहरी सांस्कृतिक संपर्कों और स्थानीय परंपराओं का समन्वय।
गुप्तकालीन कला में धार्मिक प्रतिमाओं के आदर्श रूपों का विकास।
स्थापत्य के माध्यम से राजनीतिक वैधता और राजकीय प्रतिष्ठा की अभिव्यक्ति।
धार्मिक स्मारकों का शिक्षा, आवास, तीर्थ और सामुदायिक जीवन से संबंध।
पुरातात्त्विक साक्ष्यों के माध्यम से प्राचीन समाज का पुनर्निर्माण।
मुख्य परीक्षा का दृष्टिकोण: किसी कला शैली का वर्णन करते समय उसकी विशेषताएँ बताने के साथ यह भी स्पष्ट करें कि वह किन ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित हुई और भारतीय संस्कृति के विकास में उसका क्या योगदान रहा।
2.3 UPPSC एवं State PCS में महत्व
उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों की परीक्षाओं के लिए अखिल भारतीय कला परंपराओं के साथ स्थानीय पुरातात्त्विक स्थलों पर भी ध्यान देना चाहिए।
उत्तर प्रदेश के संदर्भ में विशेष रूप से उपयोगी स्थल हैं:
सारनाथ: बौद्ध कला, धर्मचक्र प्रवर्तन और अशोक स्तंभशीर्ष के लिए प्रसिद्ध।
कौशाम्बी: प्राचीन नगरीय इतिहास तथा बौद्ध परंपरा से संबंधित महत्त्वपूर्ण स्थल।
मथुरा: प्राचीन भारतीय मूर्तिकला का प्रमुख केंद्र।
संकिसा: बौद्ध परंपरा से संबंधित ऐतिहासिक स्थल।
श्रावस्ती: बौद्ध साहित्य एवं परंपरा में महत्त्वपूर्ण स्थान।
इन स्थलों के अध्ययन में वर्तमान भौगोलिक स्थिति, संबंधित ऐतिहासिक परंपरा, प्राप्त पुरावशेष और सांस्कृतिक महत्त्व को एक साथ समझना चाहिए।
3. प्राचीन भारतीय कला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्राचीन भारतीय कला का विकास अनेक शताब्दियों में हुआ। इसमें धार्मिक विचारों, कृषि एवं व्यापार से उत्पन्न संसाधनों, शहरीकरण, राजकीय संरक्षण, शिल्पकारों की तकनीकी दक्षता तथा क्षेत्रीय परंपराओं का संयुक्त योगदान था।
3.1 प्रागैतिहासिक कला: प्रारंभिक अभिव्यक्ति
प्रागैतिहासिक शैलचित्र भारतीय उपमहाद्वीप में कला की प्रारंभिक अभिव्यक्तियों के महत्त्वपूर्ण साक्ष्य हैं। मध्य प्रदेश के भीमबेटका शैलाश्रय इस संदर्भ में विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
इन चित्रों में सामान्यतः मानव आकृतियाँ, पशु, शिकार, नृत्य और सामूहिक गतिविधियाँ दिखाई देती हैं। अलग-अलग चित्रों का काल एक जैसा नहीं है; इस क्षेत्र में विभिन्न प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक चरणों से संबंधित चित्र मिलते हैं।
ऐतिहासिक महत्त्व:
मानव समुदायों की गतिविधियों और पर्यावरण के बारे में संकेत मिलते हैं।
चित्रों में सामूहिक जीवन, शिकार तथा पशुओं के साथ मानव संबंध दिखाई देते हैं।
रंगों और चित्रण तकनीकों का अध्ययन प्रारंभिक कलात्मक अभिव्यक्ति को समझने में मदद करता है।
इन चित्रों को किसी एक निश्चित धार्मिक विश्वास का प्रत्यक्ष प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। जहाँ अर्थ स्पष्ट नहीं है, वहाँ व्याख्या को संभावित ही माना जाना चाहिए।
3.2 सिंधु घाटी सभ्यता: नगरीय जीवन और कलात्मक दक्षता
लगभग तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में परिपक्व हुई सिंधु घाटी सभ्यता ने नगरीय नियोजन, निर्माण तकनीक और लघु कलाकृतियों में उल्लेखनीय दक्षता प्रदर्शित की।
इसके प्रमुख उदाहरण हैं:
कांस्य की प्रसिद्ध नर्तकी की प्रतिमा।
स्टियाटाइट से बनी मुहरें।
पशु आकृतियों और लिपि-चिह्नों वाली मुहरें।
टेराकोटा की मानव एवं पशु आकृतियाँ।
मनके, आभूषण और अन्य शिल्प उत्पाद।
हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो जैसे नगरों की सुव्यवस्थित निर्माण परंपरा।
नर्तकी की प्रतिमा: यह धातु ढलाई की तकनीकी दक्षता का उल्लेखनीय उदाहरण है। इसे सामान्यतः मोम-क्षय विधि (Lost-wax technique) से जुड़ी प्राचीन धातु-कला के संदर्भ में पढ़ा जाता है।
मुहरें: इनसे पशु-चित्रण, शिल्प कौशल और चिह्न-प्रयोग की जानकारी मिलती है। सिंधु लिपि अभी तक निर्णायक रूप से पढ़ी नहीं जा सकी है, इसलिए मुहरों पर अंकित चिह्नों के अर्थ के बारे में सावधानी आवश्यक है।
सिंधु सभ्यता की कला का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक उपयोग वाली वस्तुओं के बीच संबंध दिखाई देता है। फिर भी प्रत्येक मूर्ति या आकृति का धार्मिक अर्थ निश्चित रूप से बताना संभव नहीं है।
3.3 वैदिक काल से महाजनपद काल तक: परिवर्तन की पृष्ठभूमि
वैदिक साहित्य में यज्ञ, अनुष्ठान, धार्मिक प्रतीकों और सामाजिक जीवन का विवरण मिलता है, लेकिन इस काल के लिए बाद के पत्थर-निर्मित स्मारकों जैसी स्थापत्य सामग्री व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि उस समय निर्माण गतिविधियाँ नहीं होती थीं। लकड़ी, मिट्टी और अन्य नष्ट होने वाली सामग्रियों से बने ढाँचों के पुरातात्त्विक अवशेष समय के साथ नष्ट हो सकते हैं।
लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से गंगा घाटी में नगरीकरण, महाजनपदों का उदय, व्यापार और नए धार्मिक आंदोलनों का विस्तार हुआ। बौद्ध तथा जैन परंपराओं के विकास ने धार्मिक उपासना, स्मृति और सामुदायिक संस्थाओं के लिए नए प्रकार के स्थलों की आवश्यकता बढ़ाई।
इसी व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में आगे चलकर स्तूपों, विहारों और शैलकृत धार्मिक परिसरों का विकास अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
3.4 मौर्य काल: राजकीय संरक्षण और स्मारकीय कला
मौर्य काल, विशेषकर सम्राट अशोक का शासन, भारतीय स्थापत्य और स्मारकीय कला के इतिहास में महत्त्वपूर्ण चरण है। इस समय शिलालेखों वाले स्तंभ, शैलकृत गुफाएँ और बौद्ध परंपरा से जुड़े स्मारकों का विकास तथा संरक्षण सामने आता है।
मौर्यकालीन कला की प्रमुख विशेषताएँ:
एकाश्म स्तंभ: एक ही पत्थर से निर्मित स्तंभों का व्यापक उपयोग।
उच्च गुणवत्ता वाली पॉलिश: कुछ पत्थर के स्तंभों और गुफाओं की सतह पर चमकदार परिष्करण।
पशु आकृतियों वाले शीर्ष: सिंह, बैल तथा अन्य पशु आकृतियों का प्रयोग।
शिलालेख: राजकीय संदेशों और धम्म संबंधी विचारों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने का माध्यम।
शैलकृत वास्तुकला: चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा-कक्ष।
बाराबर पहाड़ियों की गुफाएँ मौर्यकालीन शैलकृत वास्तुकला के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं। इनमें से कुछ गुफाएँ आजीवक संप्रदाय को समर्पित थीं। इनकी चिकनी आंतरिक सतहें और चट्टान को काटकर निर्मित कक्ष तत्कालीन तकनीकी दक्षता का परिचय देते हैं।
सारनाथ का सिंहशीर्ष अशोककालीन मूर्तिकला का प्रसिद्ध उदाहरण है। यह मूलतः एक स्तंभ का शीर्ष भाग था। भारत के राजकीय प्रतीक में इसके सिंहशीर्ष के रूप का उपयोग किया गया है, जबकि धर्मचक्र भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में अंकित है।
यहाँ एक सावधानी आवश्यक है: मौर्यकालीन राजकीय कला को केवल बौद्ध कला कहना सही नहीं होगा। अशोक के अभिलेख अनेक धार्मिक समुदायों के प्रति सम्मान तथा नैतिक आचरण से संबंधित व्यापक विचार प्रस्तुत करते हैं।
3.5 मौर्योत्तर काल: क्षेत्रीय केंद्रों और दान-परंपरा का विस्तार
मौर्य साम्राज्य के बाद शुंग, सातवाहन, कुषाण और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के काल में कला एवं स्थापत्य के अनेक रूप विकसित हुए।
इस चरण में प्रमुख परिवर्तन थे:
स्तूपों का विस्तार और सजावटी विकास।
पत्थर की वेदिकाओं, रेलिंगों और तोरणों का निर्माण।
कथात्मक उत्कीर्णनों का विस्तार।
चैत्यगृहों और विहारों की शैलकृत परंपरा का विकास।
गांधार तथा मथुरा जैसे मूर्तिकला केंद्रों की प्रतिष्ठा।
व्यापारियों, शिल्पकारों, भिक्षुओं और अन्य दानदाताओं की भूमिका।
यह विकास केवल राजाओं के आदेशों से नहीं हुआ। कई बौद्ध स्मारकों के अभिलेखों में सामान्य व्यक्तियों, व्यापारियों, भिक्षुओं, भिक्षुणियों तथा विभिन्न समूहों द्वारा दिए गए दान का उल्लेख मिलता है।
इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक स्थापत्य का निर्माण व्यापक सामाजिक भागीदारी और आर्थिक संसाधनों से भी जुड़ा था।
3.6 गुप्त काल: मंदिर और प्रतिमाओं के विकास का महत्त्वपूर्ण चरण
गुप्त काल और उससे संबंधित क्षेत्रीय परंपराएँ भारतीय मंदिर वास्तुकला तथा मूर्तिकला के इतिहास में विशेष महत्त्व रखती हैं। इस समय संरचनात्मक मंदिरों के ऐसे रूप स्पष्ट होने लगे, जिन्होंने बाद की मंदिर वास्तुकला के विकास को प्रभावित किया।
प्रमुख विशेषताएँ:
गर्भगृह पर आधारित मंदिर योजना का विकास।
मंदिर के ऊपरी भाग के स्थापत्य रूपों में प्रयोग।
देवप्रतिमाओं के अपेक्षाकृत मानकीकृत रूपों का विकास।
विष्णु, शिव तथा अन्य धार्मिक परंपराओं से संबंधित प्रतिमाओं का निर्माण।
धार्मिक कथाओं को स्थापत्य और मूर्तिकला के माध्यम से व्यक्त करना।
उत्तर प्रदेश के देवगढ़ स्थित दशावतार मंदिर को प्रारंभिक उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। मध्य प्रदेश के उदयगिरि की गुफाओं में प्राप्त वराह उत्कीर्णन गुप्तकालीन धार्मिक कला और राजकीय विचारधारा के संबंध को समझने में उपयोगी है।
गुप्तकालीन कला को भारतीय कला का महत्त्वपूर्ण उत्कर्ष माना जाता है, लेकिन इसे पूरे भारत में एक समान शैली या अचानक हुई पूर्णता के रूप में नहीं देखना चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएँ विकसित होती रहीं।
4. प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य की कालक्रमिक रूपरेखा
नीचे दी गई समय-सीमाएँ व्यापक ऐतिहासिक संकेत हैं। अलग-अलग स्मारकों के निर्माण, विस्तार और पुनर्निर्माण की तिथियाँ एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।
क्रम | काल या चरण | कला एवं स्थापत्य का प्रमुख विकास |
|---|---|---|
1 | प्रागैतिहासिक काल | शैलचित्र और शैलाश्रय |
2 | परिपक्व हड़प्पा काल, लगभग 2600–1900 ईसा पूर्व | नगरीय नियोजन, मुहरें, टेराकोटा और धातु प्रतिमाएँ |
3 | छठी शताब्दी ईसा पूर्व से आगे | नए धार्मिक आंदोलनों तथा नगरीकरण की पृष्ठभूमि |
4 | मौर्य काल, लगभग चौथी–दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का संक्रमणकाल | अशोक स्तंभ, अभिलेख, बाराबर की गुफाएँ और राजकीय स्मारकीय कला |
5 | मौर्योत्तर काल, लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से तीसरी शताब्दी ईस्वी | स्तूपों का विस्तार, तोरण, चैत्यगृह, विहार और क्षेत्रीय मूर्तिकला |
6 | कुषाण काल, लगभग पहली–तीसरी शताब्दी ईस्वी | गांधार और मथुरा कला का प्रमुख विकास |
7 | गुप्त काल, लगभग चौथी–छठी शताब्दी ईस्वी | संरचनात्मक मंदिरों और धार्मिक मूर्तिकला का विकास |
8 | गुप्तोत्तर एवं प्रारंभिक मध्यकालीन संक्रमण | क्षेत्रीय मंदिर शैलियों और शैलकृत परिसरों का विस्तार |
कालक्रम संबंधी सावधानी: स्तूप, गुफा, मंदिर और मूर्तिकला का विकास एक-दूसरे के बाद पूरी तरह समाप्त होने वाली क्रमिक अवस्थाएँ नहीं थीं। कई परंपराएँ लंबे समय तक समानांतर रूप से चलती रहीं।
5. स्तूप वास्तुकला (Stupa Architecture)
5.1 स्तूप क्या है?
स्तूप बौद्ध परंपरा से संबंधित एक स्मारकीय संरचना है, जिसका मूल संबंध पवित्र अवशेषों, बुद्ध या बौद्ध परंपरा की स्मृति तथा धार्मिक उपासना से रहा है। स्तूप के भीतर अवशेष रखे जा सकते थे, लेकिन प्रत्येक स्तूप में बुद्ध के शारीरिक अवशेष होना आवश्यक नहीं था। कुछ स्तूप स्मारक या प्रतीकात्मक महत्त्व भी रखते थे।
प्रारंभिक बौद्ध परंपरा में स्तूप का महत्त्व बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी स्मृति और अवशेषों से जुड़ा था। समय के साथ स्तूप बौद्ध धार्मिक परिदृश्य का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गए।
स्तूप को केवल समाधि या मकबरे के रूप में समझना अधूरा होगा। यह धार्मिक स्मृति, तीर्थ, अनुष्ठान और समुदाय की सामूहिक पहचान से भी जुड़ा था।
5.2 स्तूप का ऐतिहासिक विकास
बौद्ध परंपरा के अनुसार बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों का विभाजन विभिन्न समुदायों में हुआ और उनके ऊपर स्मारक बनाए गए। यह विवरण बौद्ध साहित्यिक परंपरा से प्राप्त होता है; इसे प्रत्येक स्तूप की पुरातात्त्विक तिथि का स्वतंत्र प्रमाण नहीं मानना चाहिए।
मौर्यकाल में अशोक के शासन के दौरान बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण मिला। अशोक से संबंधित परंपराएँ स्तूपों के निर्माण और विस्तार का उल्लेख करती हैं। हालाँकि, आज दिखाई देने वाले कई स्तूप अपने मूल निर्माण के बाद अनेक बार विस्तारित, पुनर्निर्मित या अलंकृत किए गए।
मौर्योत्तर काल में साँची, भरहुत और अमरावती जैसे केंद्रों पर स्तूप वास्तुकला का उल्लेखनीय विकास हुआ। पत्थर की रेलिंगों, प्रवेशद्वारों और कथात्मक उत्कीर्णनों ने इन स्मारकों को अधिक जटिल कलात्मक रूप दिया।
5.3 स्तूप के प्रमुख स्थापत्य भाग
एक विकसित स्तूप में सामान्यतः निम्नलिखित भाग पहचाने जा सकते हैं:
स्थापत्य भाग | अर्थ एवं विशेषता |
|---|---|
अंड (Anda) | स्तूप का मुख्य अर्धगोलाकार या गुंबदनुमा ठोस भाग |
मेदि (Medhi) | स्तूप के आधार या प्रदक्षिणा से संबंधित ऊँचा चबूतरा, जहाँ संबंधित संरचना में मौजूद हो |
वेदिका (Vedika) | स्तूप या पवित्र क्षेत्र को घेरने वाली रेलिंग |
प्रदक्षिणापथ | स्तूप के चारों ओर परिक्रमा करने का मार्ग |
हर्मिका (Harmika) | अंड के ऊपर स्थित छोटी चौकोर घेराबंदी |
यष्टि (Yashti) | हर्मिका के ऊपर उठने वाला केंद्रीय दंड |
छत्रावली (Chhatravali) | यष्टि पर स्थित एक या अधिक छत्र |
तोरण (Torana) | सजावटी प्रवेशद्वार, विशेष रूप से साँची के स्तूप के संदर्भ में प्रसिद्ध |
इन सभी भागों की उपस्थिति हर स्तूप में समान रूप से नहीं मिलती। संरचना का रूप स्थल, काल, संरक्षण और निर्माण के चरणों के अनुसार बदल सकता है।
5.4 स्तूप की प्रतीकात्मकता
स्तूप की स्थापत्य योजना को बौद्ध धार्मिक विचारों से जोड़कर देखा जाता है। प्रदक्षिणा श्रद्धा और सम्मान की अभिव्यक्ति थी। छत्र, ऊँचा केंद्रीय भाग और पवित्र अवशेषों का स्थान स्तूप को साधारण लौकिक भवन से अलग धार्मिक महत्त्व प्रदान करते थे।
फिर भी प्रत्येक स्थापत्य घटक का एक ही निश्चित प्रतीकात्मक अर्थ मानना उचित नहीं है। प्रतीकों की व्याख्या के लिए पुरातात्त्विक संदर्भ, बौद्ध साहित्य, अभिलेख और क्षेत्रीय परंपराओं को साथ पढ़ना आवश्यक है।
5.5 साँची का स्तूप
मध्य प्रदेश में स्थित साँची का महास्तूप प्राचीन भारतीय बौद्ध स्थापत्य का सबसे प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है।
प्रमुख विशेषताएँ:
इसकी प्रारंभिक संरचना का संबंध मौर्यकाल, विशेषकर अशोक, से जोड़ा जाता है।
बाद के चरणों में स्तूप का विस्तार और पत्थर की सजावटी संरचनाओं का विकास हुआ।
इसके चार दिशाओं में स्थित अलंकृत तोरण विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
तोरणों पर बुद्ध के जीवन, जातक कथाओं और बौद्ध परंपराओं से संबंधित दृश्य उत्कीर्ण हैं।
प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को कई दृश्यों में प्रत्यक्ष मानव आकृति के बजाय प्रतीकों द्वारा व्यक्त किया गया है।
साँची के तोरणों पर धर्मचक्र, बोधिवृक्ष, रिक्त सिंहासन और स्तूप जैसे प्रतीक बौद्ध कथाओं और स्मृति के दृश्य माध्यम हैं।
परीक्षा में सावधानी: साँची के पूरे वर्तमान स्मारक को अशोक द्वारा एक ही चरण में निर्मित मानना गलत होगा। इसकी वर्तमान स्थापत्य योजना विभिन्न ऐतिहासिक चरणों के विकास का परिणाम है।
5.6 भरहुत स्तूप
भरहुत मध्य प्रदेश में स्थित एक महत्त्वपूर्ण बौद्ध पुरातात्त्विक स्थल है। यहाँ की रेलिंगों और उत्कीर्णनों से प्रारंभिक बौद्ध कला के अध्ययन में सहायता मिलती है।
प्रमुख विशेषताएँ:
पत्थर की रेलिंगों और स्तंभों पर सजावटी उत्कीर्णन।
जातक कथाओं और बौद्ध परंपराओं से जुड़े दृश्य।
अनेक आकृतियों तथा प्रतीकों के साथ पहचान-संबंधी अभिलेख।
दानदाताओं और धार्मिक स्मृति से संबंधित साक्ष्य।
भरहुत की कला प्रारंभिक बौद्ध मूर्तिकला में कथात्मक प्रस्तुति और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति के अध्ययन के लिए उपयोगी है।
साँची और भरहुत की तुलना से पता चलता है कि बौद्ध स्मारकों में धार्मिक कथाओं को दृश्य रूप देने के साथ-साथ दान, तीर्थ और सामुदायिक भागीदारी का भी महत्त्व था।
5.7 अमरावती स्तूप
आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के क्षेत्र से संबंधित अमरावती स्तूप दक्षिण भारत की बौद्ध कला का प्रमुख केंद्र था।
इसकी कला परंपरा की विशेषताएँ हैं:
उत्कीर्ण शिलापट्टों का व्यापक उपयोग।
मानव आकृतियों और कथात्मक दृश्यों की जटिल रचना।
बुद्ध के जीवन और बौद्ध परंपराओं से जुड़े दृश्य।
गतिशील आकृतियाँ और सजावटी प्रस्तुति।
दक्षिण भारत में बौद्ध धर्म तथा व्यापारिक संपर्कों के अध्ययन में महत्त्व।
अमरावती की कलात्मक परंपरा को केवल उत्तर भारतीय कला की नकल के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसमें क्षेत्रीय शिल्प परंपराओं और स्थानीय संरक्षण की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी।
5.8 धमेख स्तूप, सारनाथ
उत्तर प्रदेश के सारनाथ में स्थित धमेख स्तूप बौद्ध धर्म के इतिहास से संबंधित महत्त्वपूर्ण स्मारक है। सारनाथ वह स्थान है जहाँ बौद्ध परंपरा के अनुसार बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना प्रथम उपदेश दिया था।
धमेख स्तूप का वर्तमान स्थापत्य रूप विभिन्न निर्माण चरणों का परिणाम है। इसके वर्तमान विशाल बेलनाकार रूप को सीधे अशोककालीन मूल संरचना के समान नहीं माना जाना चाहिए।
सारनाथ का महत्त्व केवल स्तूप तक सीमित नहीं है। यह बौद्ध कला, विशेषकर गुप्तकालीन बुद्ध प्रतिमाओं और अशोक के सिंहशीर्ष से भी संबंधित है।
5.9 प्रमुख स्तूपों की तुलना
स्तूप या स्थल | वर्तमान क्षेत्र | प्रमुख विशेषता |
|---|---|---|
साँची महास्तूप | मध्य प्रदेश | तोरण, वेदिका और बौद्ध कथात्मक कला |
भरहुत | मध्य प्रदेश | प्रारंभिक बौद्ध रेलिंग और उत्कीर्णन |
अमरावती | आंध्र प्रदेश | विकसित कथात्मक शिल्प और सजावटी उत्कीर्णन |
धमेख स्तूप | सारनाथ, उत्तर प्रदेश | बुद्ध के प्रथम उपदेश की परंपरा से जुड़ा स्थल |
धान्यकटक क्षेत्र | आंध्र प्रदेश | अमरावती क्षेत्र की व्यापक बौद्ध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि |
5.10 स्तूप वास्तुकला का ऐतिहासिक महत्त्व
स्तूपों का अध्ययन कई व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को समझने में सहायता करता है।
धार्मिक पक्ष: स्तूपों ने बुद्ध और बौद्ध परंपरा की स्मृति को भौतिक रूप दिया तथा तीर्थ और उपासना के केंद्रों का विकास किया।
आर्थिक पक्ष: निर्माण, उत्कीर्णन और रखरखाव के लिए संसाधनों की आवश्यकता थी। अभिलेखों में दर्ज दान इस आर्थिक आधार और सामाजिक भागीदारी को समझने में उपयोगी हैं।
सामाजिक पक्ष: दानदाताओं के अभिलेख बताते हैं कि धार्मिक स्थापत्य में केवल राजा ही नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक समूह भी योगदान देते थे।
कलात्मक पक्ष: रेलिंगों, तोरणों और उत्कीर्णनों ने कथाओं को दृश्य रूप दिया। इससे उस समय की पोशाक, आभूषण, वनस्पति, पशुओं, वास्तु रूपों और सामाजिक गतिविधियों के अध्ययन में सहायता मिलती है।
राजनीतिक पक्ष: राजकीय संरक्षण से धार्मिक स्मारकों को संसाधन और प्रतिष्ठा मिल सकती थी। इसके बावजूद सभी स्मारकों को केवल राजनीतिक प्रचार के साधन के रूप में देखना उनके धार्मिक और सामुदायिक महत्त्व को कम करके आँकना होगा।
6. बौद्ध गुफा वास्तुकला: चैत्यगृह और विहार
प्राचीन भारतीय गुफा वास्तुकला (Rock-cut Architecture) भारतीय शिल्पकारों की तकनीकी दक्षता और धार्मिक जीवन का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। इसमें प्राकृतिक चट्टानों को काटकर कक्ष, सभागृह, स्तंभ, बरामदे और अन्य स्थापत्य घटक बनाए जाते थे।
गुफा वास्तुकला की विशेषता यह है कि यहाँ निर्माण के लिए पत्थरों को अलग-अलग जोड़कर भवन खड़ा करने के बजाय प्रायः प्राकृतिक चट्टान को काटकर संरचना बनाई जाती थी। इसे संरचनात्मक वास्तुकला (Structural Architecture) से अलग समझना चाहिए, जिसमें पत्थर, ईंट या अन्य निर्माण सामग्री को जोड़कर भवन बनाया जाता है।
प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में बौद्ध धर्म से संबंधित चैत्यगृहों और विहारों के अनेक उदाहरण मिलते हैं। इनके अतिरिक्त आजीवक, जैन तथा हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े शैलकृत परिसर भी विकसित हुए।
6.1 चैत्यगृह क्या है?
चैत्यगृह (Chaitya Hall) मुख्यतः धार्मिक उपासना और सामूहिक अनुष्ठान से संबंधित सभागृह था। बौद्ध चैत्यगृहों में सामान्यतः स्तूप एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के रूप में स्थापित होता था।
इसके प्रमुख स्थापत्य घटक थे:
लंबा आयताकार या सभागृह जैसा आंतरिक भाग।
आगे की ओर स्तूप वाला अंतिम भाग, जो कई उदाहरणों में अर्धवृत्ताकार था।
स्तंभों से विभाजित मध्य भाग और पार्श्व मार्ग।
कुछ प्रमुख उदाहरणों में घुमावदार या बैरल-वॉल्ट जैसी छत।
प्रवेश भाग पर सजावटी वास्तु और शिल्प।
चैत्यगृह का विन्यास सभी स्थलों पर समान नहीं था। समय, क्षेत्र और धार्मिक परंपरा के अनुसार इसमें परिवर्तन हुए।
6.2 विहार क्या है?
विहार (Vihara) बौद्ध भिक्षुओं के निवास और सामुदायिक जीवन से संबंधित परिसर था। अनेक विहारों में एक केंद्रीय कक्ष या सभा-स्थान के चारों ओर छोटे कक्ष बनाए गए थे, जिनका उपयोग भिक्षुओं के रहने के लिए किया जाता था।
विहार केवल निवास स्थान नहीं था। बड़े बौद्ध केंद्रों में ऐसे परिसर अध्ययन, ध्यान, धार्मिक गतिविधियों और समुदाय के संगठन से भी जुड़े हो सकते थे।
बौद्ध मठों का विकास उस समय की धार्मिक संस्थाओं के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक इतिहास को समझने में भी मदद करता है।
6.3 चैत्यगृह और विहार में अंतर
आधार | चैत्यगृह | विहार |
|---|---|---|
मुख्य उद्देश्य | उपासना और सामूहिक धार्मिक गतिविधियाँ | भिक्षुओं का निवास और सामुदायिक जीवन |
प्रमुख स्थापत्य विशेषता | अनेक बौद्ध उदाहरणों में स्तूपयुक्त सभागृह | निवास-कक्षों वाला परिसर |
सामान्य योजना | लंबा सभागृह, स्तंभ और स्तूप की ओर जाने वाला मार्ग | केंद्रीय कक्ष के आसपास छोटे कक्ष, कई उदाहरणों में |
धार्मिक उपयोग | स्तूप के आसपास उपासना और प्रदक्षिणा | निवास, अध्ययन, ध्यान और अन्य मठीय गतिविधियाँ |
उदाहरण | कार्ले, भाजा | अजंता के अनेक विहार |
Prelims ट्रैप: चैत्यगृह को केवल भिक्षुओं का निवास और विहार को केवल स्तूप के चारों ओर परिक्रमा करने का स्थान मानना गलत है।
6.4 प्रमुख बौद्ध गुफाएँ
कार्ले की गुफाएँ
महाराष्ट्र में स्थित कार्ले की गुफाएँ अपने विशाल चैत्यगृह के लिए प्रसिद्ध हैं। यहाँ चट्टान काटकर बनाए गए सभागृह, स्तंभों की पंक्तियाँ और स्तूपयुक्त आंतरिक भाग शैलकृत वास्तुकला की विकसित परंपरा का परिचय देते हैं।
इन गुफाओं के निर्माण और संरक्षण में दानदाताओं की भूमिका का अध्ययन अभिलेखों के माध्यम से किया जा सकता है। पश्चिमी भारत के बौद्ध गुफा परिसरों को प्राचीन व्यापारिक मार्गों और आवागमन से जोड़कर भी देखा जाता है।
भाजा की गुफाएँ
भाजा की गुफाएँ महाराष्ट्र में स्थित प्रारंभिक बौद्ध शैलकृत स्थलों में शामिल हैं। यहाँ चैत्य वास्तुकला के आरंभिक रूपों और लकड़ी के निर्माण की परंपराओं से मिलती-जुलती स्थापत्य विशेषताओं का अध्ययन किया जा सकता है।
चट्टान में निर्मित कुछ संरचनाओं में लकड़ी की वास्तु परंपरा का प्रभाव दिखाई देता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि शैलकृत वास्तुकला का विकास पहले से परिचित निर्माण रूपों के साथ किस प्रकार जुड़ा हुआ था।
अजंता की गुफाएँ
महाराष्ट्र की अजंता गुफाएँ बौद्ध कला, चित्रकला, स्थापत्य और मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध हैं।
यहाँ की गुफाएँ एक ही समय में नहीं बनीं। निर्माण और सजावट के प्रमुख चरणों में प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तथा पाँचवीं शताब्दी ईस्वी के आसपास का वाकाटक-सम्बद्ध चरण शामिल है।
प्रमुख विशेषताएँ:
चैत्यगृह और विहार, दोनों प्रकार की संरचनाएँ।
बुद्ध तथा बोधिसत्त्वों से संबंधित चित्रण।
जातक कथाओं और बौद्ध परंपराओं से जुड़े दृश्य।
दीवारों और छतों पर विकसित चित्रकला।
स्तंभों, प्रवेशद्वारों और आंतरिक स्थानों का सजावटी विन्यास।
अजंता के चित्र तत्कालीन धार्मिक विचारों के साथ-साथ वस्त्र, आभूषण, राजदरबार, सामाजिक जीवन और कलात्मक तकनीकों के अध्ययन में भी सहायक हैं।
इन चित्रों को ऐतिहासिक स्रोत के रूप में उपयोग करते समय ध्यान रखना चाहिए कि धार्मिक चित्रण हमेशा दैनिक जीवन का सीधा और पूर्ण विवरण नहीं होता। दृश्य का अर्थ उसके धार्मिक तथा कथात्मक संदर्भ के साथ समझना आवश्यक है।
उदयगिरि की गुफाएँ
मध्य प्रदेश की उदयगिरि गुफाएँ गुप्तकालीन धार्मिक कला और स्थापत्य के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण हैं। यहाँ हिंदू धार्मिक परंपराओं से संबंधित शैलकृत संरचनाएँ और मूर्तिकला प्राप्त होती हैं।
विशेष रूप से विष्णु के वराह अवतार का विशाल उत्कीर्णन प्रसिद्ध है। इसे धार्मिक प्रतीकवाद, राजकीय विचारधारा और गुप्तकालीन कला के संदर्भ में पढ़ा जाता है।
बाराबर की गुफाएँ
बिहार की बाराबर पहाड़ियों में स्थित गुफाएँ मौर्यकालीन शैलकृत वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
इनकी प्रमुख विशेषताएँ:
कठोर चट्टान को काटकर बनाए गए कक्ष।
आंतरिक सतहों पर चमकदार पॉलिश।
कुछ गुफाओं का आजीवक संप्रदाय से संबंध।
मौर्यकालीन निर्माण तकनीक और धार्मिक संरक्षण के अध्ययन में महत्त्व।
परीक्षा के लिए अंतर: बाराबर की गुफाएँ मुख्यतः मौर्यकालीन शैलकृत वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं, जबकि अजंता बौद्ध गुफाओं, चित्रकला और मूर्तिकला की लंबी विकास-परंपरा के लिए विशेष रूप से जानी जाती है।
7. मंदिर वास्तुकला का विकास
भारतीय मंदिर वास्तुकला का विकास कई शताब्दियों में हुआ। इसके आरंभिक रूपों का पुनर्निर्माण पुरातात्त्विक अवशेषों, साहित्यिक स्रोतों, मूर्तियों और बाद में विकसित मंदिरों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर किया जाता है।
मंदिर का इतिहास केवल धार्मिक इमारतों का इतिहास नहीं है। यह धार्मिक अनुष्ठानों, राजकीय संरक्षण, शिल्पकारों के संगठन, क्षेत्रीय राजनीति और संसाधनों के उपयोग से भी जुड़ा हुआ है।
7.1 प्रारंभिक मंदिर वास्तुकला की पृष्ठभूमि
प्राचीन भारत में धार्मिक उपासना के लिए अनेक प्रकार के स्थानों का उपयोग होता था। इनमें प्राकृतिक स्थल, वृक्ष, वेदियाँ, स्तूप, शैलकृत कक्ष और अन्य धार्मिक संरचनाएँ शामिल थीं।
समय के साथ देवप्रतिमा पर केंद्रित उपासना और मंदिर निर्माण की विभिन्न परंपराएँ विकसित हुईं। प्रारंभिक मंदिरों में लकड़ी, ईंट और पत्थर जैसी सामग्री का प्रयोग हुआ। लकड़ी या अन्य नष्ट होने वाली सामग्री से बनी संरचनाएँ कम सुरक्षित रह पाईं, जबकि पत्थर और ईंट के कुछ मंदिर आज भी पुरातात्त्विक साक्ष्य प्रदान करते हैं।
गुप्त काल में संरचनात्मक मंदिरों के कई महत्त्वपूर्ण उदाहरण मिलते हैं। हालाँकि मंदिर निर्माण की परंपरा का आरंभ गुप्त काल से ही हुआ, ऐसा कहना सही नहीं है। इससे पहले के धार्मिक भवनों और उपासना-स्थलों के भी साक्ष्य उपलब्ध हैं।
7.2 मंदिर के प्रमुख स्थापत्य भाग
मंदिर की योजना क्षेत्र और काल के अनुसार बदलती है। फिर भी विकसित हिंदू मंदिरों में कुछ सामान्य स्थापत्य घटक पहचाने जा सकते हैं।
भाग | अर्थ एवं कार्य |
|---|---|
गर्भगृह (Garbhagriha) | मंदिर का मुख्य पवित्र कक्ष, जहाँ प्रमुख देवप्रतिमा या धार्मिक प्रतीक स्थापित होता है |
मंडप (Mandapa) | सभा, उपासना अथवा अन्य धार्मिक गतिविधियों के लिए बना स्तंभयुक्त या सभागृह जैसा भाग |
अंतराल (Antarala) | कुछ मंदिरों में गर्भगृह और मंडप के बीच का संक्रमण क्षेत्र |
शिखर (Shikhara) | उत्तर भारतीय नागर परंपरा में गर्भगृह के ऊपर उठने वाला प्रमुख ऊर्ध्वाधर स्थापत्य भाग |
विमान (Vimana) | दक्षिण भारतीय द्रविड़ मंदिरों में गर्भगृह के ऊपर निर्मित ऊपरी स्थापत्य भाग |
आमलक (Amalaka) | अनेक उत्तर भारतीय मंदिरों के शिखर के शीर्ष के निकट दिखाई देने वाला चक्राकार, धारियों वाला स्थापत्य घटक |
कलश (Kalasha) | कई मंदिरों के शीर्ष पर स्थित पात्राकार या कलश-सदृश घटक |
जगती (Jagati) | मंदिर का ऊँचा चबूतरा या आधार, जहाँ उपस्थित हो |
प्रदक्षिणापथ | पवित्र केंद्र के चारों ओर परिक्रमा के लिए मार्ग, जो कुछ मंदिर योजनाओं में मिलता है |
गोपुरम (Gopuram) | दक्षिण भारतीय मंदिर परिसरों में प्रायः प्राचीर या प्रवेश क्षेत्र पर स्थित विशाल प्रवेशद्वार-टावर |
इन शब्दों को सभी मंदिरों पर एक साथ लागू नहीं करना चाहिए। उदाहरण के लिए, प्रत्येक प्राचीन मंदिर में मंडप, अंतराल या प्रदक्षिणापथ होना आवश्यक नहीं है।
7.3 मंदिर निर्माण की प्रमुख विशेषताएँ
मंदिर वास्तुकला के विकास में निम्नलिखित परिवर्तन महत्त्वपूर्ण रहे:
संरचनात्मक निर्माण: पत्थर या ईंट के खंडों को जोड़कर स्थायी मंदिर बनाना।
गर्भगृह का महत्त्व: देवप्रतिमा या पवित्र प्रतीक के लिए केंद्रीय स्थान का विकास।
ऊर्ध्वाधर स्थापत्य: गर्भगृह के ऊपर शिखर या विमान जैसे रूपों का विकास।
मंडपों का विस्तार: धार्मिक गतिविधियों और सामुदायिक उपस्थिति के लिए अतिरिक्त स्थान।
मूर्तिकला का समावेश: बाहरी दीवारों, स्तंभों, द्वारों और अन्य भागों पर धार्मिक आकृतियों का अंकन।
क्षेत्रीय विविधता: उत्तर, दक्षिण और दक्कन में अलग-अलग स्थापत्य परंपराओं का विकास।
मंदिरों की जटिलता समय के साथ बढ़ी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी क्षेत्रों में एक ही क्रम या एक ही गति से परिवर्तन हुआ।
7.4 नागर शैली
नागर शैली उत्तर भारत की प्रमुख मंदिर वास्तुकला परंपरा है। इसकी पहचान सामान्यतः गर्भगृह के ऊपर विकसित ऊर्ध्वमुखी शिखर से की जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ:
गर्भगृह के ऊपर शिखर।
अनेक मंदिरों में आमलक और कलश जैसे शीर्ष घटक।
क्षेत्र और काल के अनुसार शिखर के अलग-अलग रूप।
दीवारों, द्वारों और बाहरी सतहों पर मूर्तिकला।
कई मंदिरों में मंडप और ऊँचा आधार।
नागर शैली को उत्तर भारत की सभी मंदिर संरचनाओं का एक समान रूप नहीं मानना चाहिए। इसके भीतर भी क्षेत्रीय उपशैलियाँ और ऐतिहासिक परिवर्तन मिलते हैं।
महत्त्वपूर्ण उदाहरण: देवगढ़ का दशावतार मंदिर, जो प्रारंभिक उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला के अध्ययन में उपयोगी है।
7.5 द्रविड़ शैली
द्रविड़ शैली दक्षिण भारत की प्रमुख मंदिर वास्तुकला परंपरा है। इसके विकसित रूपों में गर्भगृह के ऊपर पिरामिडनुमा विमान तथा मंदिर परिसर की स्पष्ट योजना दिखाई देती है।
प्रमुख विशेषताएँ:
गर्भगृह के ऊपर विमान।
कई मंदिरों में प्राचीर से घिरा परिसर।
मंडपों और अन्य सहायक संरचनाओं का विकास।
प्रवेशद्वारों पर गोपुरम का उपयोग, विशेषकर बाद के विस्तृत मंदिर परिसरों में।
आधार, दीवारों और ऊपरी भागों में अपेक्षाकृत स्पष्ट क्षैतिज विभाजन।
एक महत्त्वपूर्ण सावधानी यह है कि आज दिखाई देने वाले विशाल गोपुरमों वाले अनेक दक्षिण भारतीय मंदिर परिसर बाद के मध्यकालीन और उत्तरवर्ती निर्माण चरणों का परिणाम हैं। इन्हें सीधे प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषता नहीं माना जा सकता।
7.6 वेसर शैली
वेसर शब्द का प्रयोग मुख्यतः दक्कन की कुछ मंदिर वास्तुकला परंपराओं और उनमें नागर तथा द्रविड़ रूपों के संयोजन को समझाने के लिए किया जाता है।
हालाँकि, वेसर की परिभाषा और इसकी सीमाओं को लेकर स्थापत्य इतिहास के अध्ययन में अलग-अलग वर्गीकरण मिलते हैं। इसलिए इसे किसी एक सार्वभौमिक, निश्चित मिश्रित शैली की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
कर्नाटक के चालुक्यकालीन और संबंधित क्षेत्रीय मंदिरों में स्थापत्य प्रयोगों तथा विभिन्न रूपों के समन्वय का अध्ययन विशेष रूप से उपयोगी है।
7.7 नागर, द्रविड़ और वेसर शैली में अंतर
आधार | नागर | द्रविड़ | वेसर |
|---|---|---|---|
प्रमुख क्षेत्र | उत्तर भारत | दक्षिण भारत | दक्कन के कुछ क्षेत्र |
गर्भगृह के ऊपर का प्रमुख रूप | सामान्यतः ऊर्ध्वमुखी शिखर | सामान्यतः पिरामिडनुमा विमान | विभिन्न रूपों का क्षेत्रीय संयोजन |
क्षेत्रीय विविधता | अनेक उपशैलियाँ | अनेक उपशैलियाँ | परिभाषा और वर्गीकरण में मतभेद |
उदाहरण | देवगढ़ का दशावतार मंदिर | दक्षिण भारतीय विमान-प्रधान मंदिर परंपराएँ | चालुक्यकालीन दक्कन के कुछ मंदिर |
UPSC के लिए उपयोगी निष्कर्ष: मंदिर शैली की पहचान केवल किसी एक सजावटी तत्व से नहीं, बल्कि उसकी संपूर्ण योजना, ऊपरी संरचना, क्षेत्रीय परंपरा और काल के संदर्भ में करनी चाहिए।
8. गुप्तकालीन मंदिर और स्थापत्य के प्रमुख उदाहरण
8.1 देवगढ़ का दशावतार मंदिर
उत्तर प्रदेश के ललितपुर क्षेत्र में स्थित देवगढ़ का दशावतार मंदिर प्रारंभिक उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
इसका संबंध सामान्यतः गुप्तकालीन मंदिर परंपरा से जोड़ा जाता है। यह विष्णु से संबंधित धार्मिक प्रतिमाओं और स्थापत्य के अध्ययन में विशेष उपयोगी है।
प्रमुख विशेषताएँ:
संरचनात्मक मंदिर निर्माण।
ऊँचे आधार पर निर्मित मंदिर योजना।
गर्भगृह और उससे संबंधित स्थापत्य घटक।
विष्णु से संबंधित धार्मिक उत्कीर्णन।
प्रारंभिक नागर परंपरा के विकास को समझने में महत्त्व।
इस मंदिर के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारतीय मंदिर वास्तुकला का विकास एक ही बार में पूर्ण विकसित रूप में नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न प्रयोगों और क्षेत्रीय परंपराओं के माध्यम से आगे बढ़ा।
8.2 भितरगाँव मंदिर
उत्तर प्रदेश के कानपुर क्षेत्र में स्थित भितरगाँव का प्राचीन मंदिर ईंटों से निर्मित मंदिर वास्तुकला का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इसे सामान्यतः गुप्तकालीन मंदिर परंपरा से संबंधित माना जाता है।
इसकी विशेषता यह है कि यह पत्थर के मंदिरों के साथ ईंटों के उपयोग की स्थापत्य परंपरा को भी सामने लाता है।
परीक्षा उपयोगिता: प्राचीन भारतीय मंदिर वास्तुकला का अध्ययन करते समय यह मान लेना गलत है कि सभी महत्त्वपूर्ण मंदिर केवल पत्थर से ही बनाए गए थे।
8.3 भीतरगाँव और देवगढ़ की तुलना
आधार | भितरगाँव मंदिर | देवगढ़ का दशावतार मंदिर |
|---|---|---|
वर्तमान राज्य | उत्तर प्रदेश | उत्तर प्रदेश |
निर्माण सामग्री | मुख्यतः ईंट | मुख्यतः पत्थर |
ऐतिहासिक संदर्भ | गुप्तकालीन मंदिर परंपरा | गुप्तकालीन मंदिर परंपरा |
प्रमुख महत्त्व | ईंट आधारित मंदिर वास्तुकला | प्रारंभिक उत्तर भारतीय मंदिर योजना और विष्णु-संबंधी मूर्तिकला |
9. प्राचीन भारतीय कला के अध्ययन में उपयोगी शब्दावली
शब्द | अर्थ एवं परीक्षा संबंधी महत्त्व |
|---|---|
स्तूप | बौद्ध परंपरा से संबंधित स्मारकीय संरचना |
चैत्य | धार्मिक उपासना या पवित्र स्थल से संबंधित शब्द; बौद्ध स्थापत्य में चैत्यगृह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण |
विहार | बौद्ध मठ या भिक्षुओं के निवास से संबंधित परिसर |
प्रदक्षिणा | पवित्र केंद्र के चारों ओर परिक्रमा |
तोरण | सजावटी प्रवेशद्वार, जैसे साँची के स्तूप के प्रवेशद्वार |
वेदिका | रेलिंग या घेराबंदी |
हर्मिका | स्तूप के अंड के ऊपर स्थित छोटी चौकोर घेराबंदी |
यष्टि | स्तूप के ऊपरी भाग में स्थित केंद्रीय दंड |
छत्रावली | स्तूप की यष्टि पर स्थित छत्रों का समूह |
गर्भगृह | मंदिर का मुख्य पवित्र कक्ष |
मंडप | मंदिर का सभा या उपासना संबंधी भाग |
शिखर | उत्तर भारतीय मंदिरों के ऊपरी भाग का प्रमुख रूप |
विमान | दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला में गर्भगृह के ऊपर का स्थापत्य भाग |
आमलक | कई नागर मंदिरों में शिखर के शीर्ष के निकट स्थित चक्राकार घटक |
गोपुरम | दक्षिण भारतीय मंदिर परिसर का विशाल प्रवेशद्वार-टावर |
शैलकृत वास्तुकला | प्राकृतिक चट्टान को काटकर निर्मित संरचना |
संरचनात्मक वास्तुकला | निर्माण सामग्री को जोड़कर निर्मित भवन |
उत्कीर्णन | किसी सतह पर आकृति या दृश्य को काटकर उकेरने की कला |
मूर्तिकला | त्रिआयामी या उभरी हुई आकृतियों का निर्माण |
भित्तिचित्र | दीवार या अन्य स्थायी सतह पर बनाया गया चित्र |
10. प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य के प्रमुख स्रोत
प्राचीन कला का इतिहास केवल स्मारकों को देखकर नहीं लिखा जाता। इसके लिए पुरातात्त्विक अवशेषों, अभिलेखों, साहित्यिक स्रोतों और ऐतिहासिक संदर्भों का संयुक्त अध्ययन आवश्यक है।
10.1 पुरातात्त्विक स्रोत
इनमें शामिल हैं:
स्तूप, मंदिर और गुफाएँ।
मूर्तियाँ तथा उत्कीर्णन।
स्तंभ और स्थापत्य खंड।
निर्माण सामग्री तथा तकनीकी अवशेष।
मिट्टी की मूर्तियाँ, मुहरें और अन्य कलाकृतियाँ।
पुरातात्त्विक संदर्भ से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कोई वस्तु किस स्तर, संरचना या ऐतिहासिक चरण से संबंधित है। केवल शैलीगत समानता के आधार पर किसी कलाकृति की तिथि निश्चित करना हमेशा संभव नहीं होता।
10.2 अभिलेखीय स्रोत
अभिलेखों से स्मारकों के निर्माण, दान, संरक्षण और संबंधित व्यक्तियों के बारे में जानकारी मिल सकती है।
उदाहरण के लिए, बौद्ध स्थलों पर प्राप्त दान संबंधी अभिलेख धार्मिक स्मारकों के आर्थिक आधार तथा विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी को समझने में उपयोगी हैं।
अशोक के अभिलेख मौर्यकालीन राजकीय विचारों और धम्म संबंधी संदेशों का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। हालांकि, किसी अभिलेख में उल्लिखित स्थल या घटना की पहचान करते समय उसके पाठ, भाषा, लिपि और पुरातात्त्विक संदर्भ को साथ पढ़ना चाहिए।
10.3 साहित्यिक स्रोत
बौद्ध साहित्य, जातक कथाएँ, जैन साहित्य, पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथ धार्मिक मान्यताओं तथा सांस्कृतिक परंपराओं की जानकारी देते हैं।
लेकिन साहित्यिक वर्णन और पुरातात्त्विक साक्ष्य हमेशा एक ही प्रकार की जानकारी नहीं देते। किसी कथा में वर्णित भवन को किसी विशेष उत्खनित संरचना के साथ सीधे जोड़ने के लिए अतिरिक्त प्रमाण आवश्यक होते हैं।
10.4 विदेशी विवरण
विदेशी यात्रियों और लेखकों के विवरण कुछ ऐतिहासिक स्थलों, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक प्रथाओं के अध्ययन में उपयोगी हो सकते हैं। फिर भी उनके विवरणों को उनके समय, उद्देश्य और जानकारी के स्रोतों के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।
स्रोत-अध्ययन का मूल सिद्धांत: किसी स्मारक की तिथि, संरक्षक, धार्मिक पहचान और ऐतिहासिक महत्त्व निर्धारित करते समय एक से अधिक प्रकार के साक्ष्यों का मिलान करना सबसे विश्वसनीय तरीका है।
प्राचीन भारतीय कला एवं स्थापत्य: स्तूप, गुफाएँ, मंदिर और मूर्तिकला Part 2
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